भरोसा देकर थोड़ी देर के साथी हमारा दिल लूट जाते हैं,
मतलब तक साथ निभाते सभी फिर छूट जाते हैं।
हार बार बाज़ार में सजता है कुंभ की तरह वादों का मेला,
सपने सामने दिखाते पीछे छिपाकर चालाकी गुरु और चेला,
मंच पर वक्ता बदलते है मगर जुबां से बात एक ही सुनाते,
शब्दों का जादू जिनका चल जाये वह कीमत लेकर भुनाते,
जहान को बदलने का नारा सुनते हुए लोगों के कान पक गये,
न हालात बदले न वादों की शक्ल सौदागर आते रोज नये,
कहें दीपक बापू ऊंची बातें करते हैं छोटी नीयत के लोग
हम तो एक कान से सुनते दूसरे से निकाले जाते हैं।

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