"अगर हमारा राज होता तो हम परीक्षा में किताब ही उपलब्ध करा देते.........लालू यादव ने अपने विवादित बयान का किया खंडन ।।।
मीडिया में एक वर्ग ऐसा है जो "राँची की बात को कराची" ले जाता है एवं "News' देने की बजाय "Views" देने में लग जाता है। अपने फायदे और हित के लिए ये लोग किसी भी बयान को तोड़-मरोड़ कर पेश करके एक व्यक्ति विशेष की नकारात्मक छवि गढ़ने में लग जाते है। मेरी बात की गंभीरता और दूरदर्शिता को ना समझ ये लोग उसे नकारात्मक डिबेट का रूप दे रहे है। see more
रविवार को बक्सर जिले में एक नए स्कूल के उद्घाटन में मैंने बिहार में हो रही मैट्रिक परीक्षा में चार-पाँच मंज़िलों तक दीवारों पर छिपकिली की तरह चढ़कर और खिड़कियों के छज्जे पर खड़े होकर अपनी जान जोखिम में डाल परीक्षा में नकल करा रहे अभिभावकों के बारें में टिप्पणी की थी कि कैसे ये लोग परीक्षा हाल के अंदर घुसकर हर तरीका आजमाकर परीक्षार्थियों को नक़ल कराने पर आमदा है। परीक्षा में नकल से बच्चों के भविष्य को लेकर चिंतित होकर हल्के अंदाज में मैंने कहा कि बिहार की शिक्षा व्यवस्था कैसी हो गई है, यह सभी लोग देख रहे हैं. इस तरह पास करने से छात्रों को क्या फायदा होगा? क्या फायदा है ऐसी पढाई से? मैंने मैट्रिक परीक्षा में हुई चीटिंग पर चिंता जताते हुए लोगों से कहा कि इससे देश भर में बिहार की छवि धूमिल हुई है और नक़ल से पास हुए बच्चे बिहार से बाहर पढ़ने एवं नौकरी करने जाएंगे तो उनकी डिग्री पर कोई विश्वास नहीं करेगा। तब मैंने अपने अंदाज में सभा में कहा, "अगर हमारा राज होता तो हम परीक्षा में किताब ही उपलब्ध करा देते. अरे भई बच्चे जो पढ़े हैं, वही तो लिखेंगे।
मैं जानता हूँ की परीक्षा में "खुली किताब का प्रयोग' विश्व के कई प्रमुख विश्वविद्यालयों में प्रचलित है। देश और विश्व के कई विद्वान एवं मुख्य शिक्षाविद इस प्रणाली के पक्ष में है । जो विद्यार्थी पुरे वर्ष बुक पढ़ेगा ही नहीं वो परीक्षा में उसमें उत्तर भी नहीं ढूंढ सकता। परीक्षा में किताबों से वही प्रश्न का उत्तर ढूंढ़ सकता है, जिसने उसे पढ़ा होगा। पाठ्यक्रम की पुस्तकें नहीं पढ़ने वाले परीक्षार्थी उससे उत्तर नहीं तलाश सकते। एक सवाल का जवाब देते-देते तीन घंटे की अवधि खत्म हो जाएगी, जिससे वे फेल हो जाएंगे।
अब आप लोग ही बताओ कौन सही है और कौन गलत?


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