प्रधानमंत्री जी, घोटाला होने वाला है
प्रधानमंत्री जी, घोटाला होने वाला है |
भले ही सूरज पश्चिम से उगना शुरू कर दे, देश में सत्ता परिवर्तन हो जाए, प्रधानमंत्री बदल जाएं, रक्षा मंत्री बदल जाएं, लेकिन हमारे देश में कुछ चीजें ऐसी हैं, जो कभी नहीं बदल सकतीं. उनमें से एक है देश के रक्षा सौदों पर हथियार माफिया का नियंत्रण. देश की थल सेना, वायु सेना और नौसेना को अगर कोई भी सामान खरीदना हो, तो उसमें हथियार माफिया का हस्तक्षेप एक बह्मसत्य है. उनके बिना न तो सामान खरीदा जा सकता है और न उसे उपलब्ध कराया जा सकता है. जानकार बताते हैं कि उनकी पकड़ इतनी मजबूत है कि अगर उन्हें हटा दिया जाए, तो रक्षा मंत्रालय विदेशी बाज़ार से एक भी हथियार नहीं खरीद पाएगा. हथियार माफिया को हिंदुस्तान में ऑपरेट करने की खुली छूट मिली हुई है. वे इज्जतदार और हाई प्रोफाइल लोग हैं. देश के हर राजनीतिक दल और ज़िम्मेदार अधिकारियों को उनके बारे में पूरी जानकारी है, बावजूद इसके उन हथियार माफिया का कारोबार बिना किसी रोक-टोक के जारी है. मोदी सरकार आने के बाद भी वे सक्रिय हैं और रक्षा मंत्रालय द्वारा किए जाने वाले हर सौदे में उनका हस्तक्षेप है. हथियार माफिया का खेल ऐसा है, जिसमें ऊपर से लेकर नीचे तक सब उनके प्यादे बन जाते हैं. सवाल यह है कि क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हथियार के दलालों का जाल नष्ट कर पाएंगे या फिर उनका यह खेल बदस्तूर चलता रहेगा?
अक्टूबर 2014 में भारत सरकार ने इजराइल से स्पाइक मिसाइल खरीदने का फैसला लिया. रक्षा मंत्रालय ने अमेरिका की जैवलिन मिसाइल खारिज करके स्पाइक मिसाइल चुनी. सरकार ने 8,365 मिसाइलें और 321 लाउंचर खरीदने का फैसला लिया. यह डील 3,200 करोड़ रुपये की है. जैवलिन और स्पाइक, दोनों ही घातक एंटी टैंक मिसाइल हैं. इसमें कोई शक नहीं है कि इस कैटेगरी में जैवलिन दुनिया की सबसे बेहतरीन मिसाइल है, इसलिए उसकी क़ीमत ज़्यादा है. स्पाइक भी एक कारगर मिसाइल है, लेकिन वह जैवलिन से सस्ती है. उसमें पाकिस्तान और चीन के टैंकों को तबाह करने की पूरी क्षमता है. उसे कंधे पर रखकर चलाया जाता है. ये सारे गुण अमेरिका की जैवलिन मिसाइल में भी हैं. अमेरिका ने जैवलिन मिसाइल बेचने के लिए टेक्नोलॉजी देने और डीआरडीओ के साथ मिलकर भारत में उसे बनाने का भी ऑफर दिया, लेकिन बात नहीं बनी. सरकार का फैसला इजराइल की स्पाइक मिसाइल के पक्ष में हुआ, लेकिन हाल में ही यह खबर आई कि स्पाइक डील में बाधा पैदा हो गई है. डील फाइनल होने के सात महीने के बाद अब स्पाइक मिसाइल की क़ीमत को लेकर विवाद हो गया है. इजराइली कंपनी अब ज़्यादा क़ीमत वसूलना चाहती है, जिस पर भारत को ऐतराज है. बताया जाता है कि अपने कॉम्सियल बिड में उसने मिसाइल की क़ीमत सीधे दोगुनी कर दी है. साथ ही वह भारत में उसे बनाने और टेक्नोलॉजी देने की क़ीमत अलग से मांग रही है. इसके अलावा हर सप्लाई पर सालाना चार फीसद की बढ़ोत्तरी की मांग है. यही नहीं, उसने क्वॉलिटी की खराबी या गिरावट की ज़िम्मेदारी लेने से भी इंकार कर दिया है. स्पाइक की जो क़ीमत अब इजरायली कंपनी मांग रही है, उतने में तो अमेरिका की जैवलिन मिसाइल आ सकती है. अमेरिका टेक्नोलॉजी देने और भारत में उसे बनाने के लिए भी तैयार है. इसलिए रक्षा मंत्रालय ने इस सौदे पर आगे बढ़ने से मना कर दिया है और इजराइली कंपनी को फिर से सोच-विचार करने को कहा है. अब सवाल यह है कि सौदे की मंजूरी के सात महीने बाद ऐसा क्या हुआ, जिसकी वजह से स्पाइक मिसाइल की क़ीमत दोगुनी हो गई? क्या हथियार लॉबी के हस्तक्षेप की वजह से उसकी क़ीमत बढ़ गई? हथियारों की खरीद में माफिया कैसे अपना नियंत्रण रखने में सफल होते हैं? क्या अब भारत स्पाइक मिसाइल नहीं लेगा? सेना के पास अत्याधुनिक एंटी टैंक मिसाइल हो, इसके लिए क्या करने की ज़रूरत है? इसे समझने के लिए सेना में खरीद-बिक्री की प्रक्रिया को समझना ज़रूरी है.
भारत सरकार सेना के लिए जो भी चीज खरीदती है, चाहे वह हथियार हो, कारतूस हो, हवाई जहाज हो, युद्धपोत हो, मिसाइल हो, उसके लिए वह क्वॉलिटी रिक्वायरमेंट यानी आवश्यक गुणवत्ता जारी करती है. यानी सेना बताती है कि उसे क्या चाहिए, किस उद्देश्य के लिए चाहिए, उसकी गुणवत्ता कैसी होनी चाहिए और कितनी संख्या में चाहिए? उसके बाद हथियार बनाने वाली कंपनियां अपना प्रस्ताव भेजती हैं. समझने वाली बात यह है कि अगर कोई भी चीज हम दूसरे देश से खरीदते हैं, तो विक्रेता देश खरीददार को अपनी लेटेस्ट टेक्नोलॉजी नहीं देता. वह वही चीज देता है, जो उसके यहां पहले इस्तेमाल हो चुकी होती है या फिर जिसका नवीन संस्करण आ चुका हो. या फिर वह चीज, जो ग़रीब देशों के लिए बनाई गई हो, ताकि वे कभी भी उसके (विक्रेता) हथियारों को मैच न कर सकें यानी उसके हथियारों के साथ मुक़ाबला न कर सकें. होना तो यह चाहिए कि अगर हम क़ीमत देने को तैयार हैं, तो हमें अत्याधुनिक और हमारी उपयोगिता के अनुकूल हथियार मिलें. लेकिन हक़ीक़त में ऐसा होता नहीं है. यहीं से हथियार माफिया का खेल शुरू होता है. विडंबना यह है कि देश के अधिकारी ही आवश्यक गुणवत्ता यानी क्वॉलिटी रिक्वायरमेंट को हल्का कर देते हैं. यह काम सेना और मंत्रालय में बैठे अधिकारी करते हैं. हर जगह ऐसे लोग बैठे हैं, जो गुणवत्ता के मापदंड ऐसे रखते हैं, जो हथियार माफिया के प्रस्ताव से बिल्कुल मिलते- जुलते हों. हथियार के दलाल किसी न किसी की कंपनी के लिए लॉबिंग करते हैं. भारत सरकार को उनके (विदेशी कंपनियों के) हथियार बेचने के लिए वे उनसे काफी पैसे लेते हैं. वे रिपोर्ट बनाने वाले अधिकारियों और उनसे जुड़े लोगों को पैसे देते हैं, ताकि अधिकारी हथियार की क्वॉलिटी तब तक गिराते रहें, जब तक वह दलालों के माल से मैच न कर जाए.
इसके बाद सौदे से संबंधित हथियार-उपकरण अथवा सामान का परीक्षण होता है. उसमें भी गड़बड़िया होती हैं. बोफोर्स कांड में यही हुआ था. जब तक क्वात्रोची उस डील में नहीं घुसे, तब तक परीक्षण में बोफोर्स पिछड़ रही थी, लेकिन जैसे ही क्वात्रोची उसमें बिचौलिया बने, ट्रायल में बोफोर्स पहली पसंद बन गई. जानकार बताते हैं कि अगर कोई इस क्यूआर में फेरबदल करने की कोशिश करता है, तो उसे पूरी प्रक्रिया से बाहर कर दिया जाता है या फिर उस पर दबाव डाला जाता है. कागज पर तो यह प्रक्रिया बिल्कुल सटीक नज़र आती है, लेकिन हक़ीक़त में यह सारी प्रक्रिया इसलिए होती है, ताकि संबंधित सामान मुहैय्या कराने के लिए आ़िखर में स़िर्फ एक या दो ही कंपनी बचे. यह वह कंपनी होती है, जिसके लिए हथियार माफिया लॉबिंग कर रहा होता है. अब जब एक ही सप्लायर बच जाता है, तो सरकार के पास उससे सौदा करने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं बचता. रक्षा मंत्रालय की ज़्यादातर खरीद में यही होता है. और, स्पाइक मिसाइल मामले में भी यही हो रहा है.
कहने का मतलब यह कि सेना की जो भी ज़रूरत हो, सरकार कुछ भी खरीदना चाहे, ड्रेस या फिर मिसाइल, आ़िखरकार वह सब दलालों के हाथों ही खरीदना पड़ता है. इससे कोई फर्क़ नहीं पड़ता कि वह हथियार या सामान विश्वस्तरीय है या नहीं. भारतीय सेना के लिए उपयोगी है या नहीं. यही वजह है कि भारतीय सेना को हमेशा घटिया उपकरण मिलते रहे हैं. एक तऱफ उसे हथियार विश्वस्तरीय नहीं मिलते, वहीं दूसरी तऱफ बुलेटप्रूफ जैकेट इतनी भारी दी जाती है, जिसे जवान पहनना नहीं पसंद करते. बर्फीले इलाके में जवानों को दिए जाने वाले जूते ऐसे होते हैं, जिनसे उनके पैर खराब हो जाते हैं. खराब सामान लेने का सिलसिला कई सालों से चला आ रहा है. मीडिया में भी कई बार खबरें आ चुकी हैं, लेकिन रक्षा मंत्रालय में बैठे मंत्री से लेकर अधिकारियों तक की नज़र आज तक इस ओर नहीं गई. धांधली का आलम यह है कि कई बार ऐसा होता है कि जो सामान हम खरीदते हैं, उसका जवाब या उससे बेहतर हथियार चीन या पाकिस्तान के पास पहले से उपलब्ध होता है. हमारे हज़ारों करोड़ रुपये बर्बाद हो जाते हैं. एक उदाहरण देता हूं. बुमार पोलेंड कंपनी से हमने आर्म्ड रिकवरी व्हीकल लिया. यह लैंड माइन क्लियर करता है और रास्ता बनाता है. लेकिन, देश के नक्सलियों और आतंकियों के पास लैंडमाइन बिछाने की वह तकनीक मौजूद है, जिसमें यह काम नहीं करता. इसलिए हमारे ये वाहन बेकार हो गए.
भारत में हथियार लॉबी बहुत सक्रिय और संगठित तरीके से काम करती है. उसके आगे सरकार की भी नहीं चलती. वह पैसे के दम पर अपने हिसाब से सौदा तय करती है. ऐसा लगता है, मानो रक्षा मंत्रालय भारतीय सेना के लिए सामान खरीदने के लिए नहीं, बल्कि हथियार के दलालों को फायदा पहुंचाने के लिए काम करता है. भारत में हथियार लॉबी बहुत बड़ी नहीं है. पांच से दस लोगों का एक कॉकस है, गैंग है. उसके सबसे बड़े और किंग पिन का नाम सुधीर चौधरी है, जो इंग्लैंड में रहकर सब कुछ ऑपरेट करता है. बराक मिसाइल की आपूर्ति में हुए घोटाले में भी उसका नाम आया था, लेकिन सीबीआई ने केस बंद कर दिया. सीबीआई ने कहा कि वह उसके खिला़फ कोई सुबूत एकत्र नहीं कर सकी. मीडिया भी चौधरी के बारे में नहीं बताता कि उसके पारिवारिक रिश्ते किन-किन पार्टियों के किन-किन नेताओं के साथ हैं. इसके अलावा भी कुछ और नाम हैं, जिनका खुलासा अलग-अलग हथियार सौदों में हुआ है, जिनमें सुरेश नंदा, रवि ऋषि और अभिषेक वर्मा शामिल हैं. उक्त सारे लोग मिल-जुल कर काम करते हैं. उनके साथ सेना एवं रक्षा मंत्रालय के अधिकारी, विभिन्न पार्टियों के नेता और पत्रकार मिल-जुल कर काम करते हैं. यह एक ऐसा गैंग है, जो हर सौदे पर मुना़फा कमाता है. इससे कोई फर्क़ नहीं पड़ता कि सरकार किस पार्टी की है और मंत्री कौन है. मजेदार बात यह है कि दिल्ली के सत्ता के गलियारों में इसे सारे लोग बखूबी जानते हैं.
अब स्पाइक मिसाइल की बात करते हैं. जर्मनी की एक हथियार कंपनी है, राइनमेटल. इसे ब्लैकलिस्ट कर दिया गया है. लेकिन, इस कंपनी की देश की हथियार लॉबी के साथ साठगांठ है. यह उन्हें पैसा देती है. भारत के कई रिटायर सैन्य अधिकारी राइनमेटल कंपनी के कंसलटेंट हैं, उसके एडवाइजरी पैनल में हैं. यह कंपनी भारत में खूब पैसा खर्च करती है. सरकार ने जब एंटी टैंक मिसाइल खरीदने का फैसला किया, तो यह कंपनी सीधे तौर पर इस सौदे में हिस्सा नहीं ले सकती थी. मजेदार बात यह है कि जिस यूरोस्पाइक नामक कंपनी के ज़रिये इस मिसाइल की मार्केटिंग की जाती है, उसमें राइनमेटल कंपनी की 40 फीसद हिस्सेदारी है. कहने का मतलब यह कि तकनीकी तौर पर इसे इजराइल की राफेल कंपनी बनाती है, लेकिन इसे बेचने में राइनमेटल की हिस्सेदारी है. सीधे शब्दों में अगर समझा जाए, तो राइनमेटल खुद इसकी सप्लाई न करके इजराइल की राफेल के ज़रिये सप्लाई कराएगी. राइनमेटल एक हथियार कंपनी है, जिसका पैसा दुनिया की विभिन्न कंपनियों में लगा हुआ है. सरकार को पता लगाना चाहिए कि इजराइल की राफेल कंपनी के साथ राइनमेटल का क्या रिश्ता है? बताया जाता है कि राफेल के 40 फीसद शेयर राइनमेटल के पास हैं. अगर हमें राइनमेटल से ही मिसाइल खरीदनी है, तो यह सौदा बैन हटाकर सीधे उसी से किया जा सकता है. इससे पैसे की बचत हो सकती है.
जब भी कोई हथियार या अन्य सामान खरीदा जाता है, तो सरकार पहले अपनी इच्छा जताती है और फिर अलग-अलग कंपनियों से प्रस्ताव आते हैं. जो प्रस्ताव सही होता है, उसे मंजूर कर लिया जाता है. यह सौदा सरकार मेक इन इंडिया के तहत करना चाहती है. रक्षा मंत्रालय ने इस बात पर ध्यान नहीं दिया कि राफेल का राइनमेटल से क्या रिश्ता है? अगर राफेल से राइनमेटल का कोई रिश्ता है और उसी कंपनी से मिसाइल खरीदना तय है, तो उसके ब्लैकलिस्ट होने का कोई मतलब नहीं है. सवाल यह है कि रक्षा मंत्रालय ने इस तथ्य की तऱफ ध्यान क्यों नहीं दिया? किस लॉबी के दबाव में यह फैसला लिया गया? इस फैसले में कौन-कौन लोग शामिल हैं? क्या इस सौदे के लिए दलाली के रूप में पैसे दिए गए? इन सारे सवालों का जवाब सरकार के पास होना चाहिए और उसे देश की जनता को इसके बारे में बताना चाहिए. मजेदार बात यह है कि उक्त सारे फैसले मोदी सरकार बनने के बाद लिए गए हैं. इसलिए यह भी नहीं कहा जा सकता कि कांग्रेस सरकार ने यह फैसला लिया था. यह सौदा मेक इन इंडिया के तहत होना है. मतलब यह कि इसे बनाने का काम भारत में किया जाएगा. तो अब सवाल यह है कि इसे कौन बनाएगा? क्या इजराइल की कंपनी भारत में मिसाइल बनाने की यूनिट लगाएगी या किसी और निजी कंपनी को इसकी इजाजत दी जाएगी?
नोट करने वाली बात यह है कि भारत सरकार की अपनी एक कंपनी है, जहां पहले से मिसाइल बनाई जा रही है. इसका नाम है, भारत डायनामिक्स लिमिटेड. वह पिछले कई सालों से मिसाइल बनाने का काम सफलता से कर रही है. अगर भारत में ही स्पाइक मिसाइल बननी है, तो उसे भारत डायनामिक्स के ज़रिये बनाया जा सकता है. उसके पास अनुभवी लोग हैं, टेक्नोलॉजी है, इंफ्रास्ट्रक्चर है. भारत डायनामिक्स के पास मिसाइल बनाने का पूरा सेटअप है और सबसे बड़ी बात यह कि वह सरकारी है. मिसाइल के किसी दूसरे देश या संगठन को बेचने का खतरा नहीं है. क्या बन रहा है और कितनी संख्या में बनाया जा रहा है, सब कुछ सरकार के नियंत्रण में रहेगा. यह सस्ता भी पड़ेगा. लेकिन, हैरानी की बात यह है कि भारत डायनामिक्स के प्रस्ताव पर रक्षा मंत्रालय ने ग़ौर भी नहीं किया. उसकी जगह रक्षा मंत्रालय ने बाबा कल्याणी नामक एक छोटी-सी कंपनी को हरी झंडी दे दी. इजराइल की राफेल कंपनी अब बाबा कल्याणी के साथ ज्वाइंट वेंचर में भारत में स्पाइक मिसाइल बनाएगी. फिर वही सवाल कि इस कंपनी पर रक्षा मंत्रालय क्यों मेहरबान हुआ? इस कंपनी का भारत की हथियार लॉबी से क्या रिश्ता है? क्या मोदी सरकार हथियार के दलालों को हथियार निर्माता बनने में मदद कर रही है? यह सवाल इसलिए भी उठाना ज़रूरी है, क्योंकि इस कंपनी के पास मिसाइल बनाने का न तो अनुभव है, न उसके पास लोग हैं, न उसके पास टेक्नोलॉजी है और न भारत में उसका इंफ्रास्ट्रक्चर है. मतलब यह कि बाबा कल्याणी को सरकार इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करने में तरह-तरह की मदद करेगी. भारत में कंपनी स्थापित करने में जो खर्च आएगा, वह भी मिसाइल की क़ीमत में जुड़ेगा. कोई भी कंपनी अपना ऩुकसान करके मेक इन इंडिया में क्यों इंवेस्ट करेगी? यही वजह है कि स्पाइक मिसाइल की क़ीमत दोगुनी हो गई और नई-नई शर्तें सामने आ गईं. अगर उसकी बातें मान ली गईं, तो शायद सरकार जवाब देने लायक नहीं बचेगी.
जानकार बताते हैं कि भारत डायनामिक्स के ज़रिये मिसाइल बनाने में दलालों को ऩुकसान होगा. चूंकि वह एक सरकारी कंपनी है और उसमें एक-एक पैसे का हिसाब और ऑडिटिंग होती है, इसलिए वहां घोटाला करना नामुमकिन है. सरकारी कंपनी दलाली के नाम पर पैसे नहीं बांट सकती. लेकिन, यदि किसी निजी कंपनी के ज़रिये यह सौदा होता है, तो दलालों के लिए रास्ता खुल जाता है. दलाली के नाम पर पैसे की बंदरबांट हो सकती है. बाबा कल्याणी को अगर मिसाइल बनाने की अनुमति दी जाती है, तो हथियार लॉबी को कई फायदे हैं. कंपनी लगाने में वह अपनी ब्लैक मनी खपा सकती है. अधिकारियों को उनका हिस्सा मिल जाएगा और निजी कंपनी का भी विस्तार हो जाएगा. अब सवाल है कि क्या यह फैसला जानबूझ कर लिया गया, ताकि दलाली के पैसे की बंदरबांट हो सके या फिर कोई और तर्क है? इसका खुलासा सरकार को सार्वजनिक रूप से करना चाहिए. अगर भारत को स्पाइक मिसाइल ही चाहिए, तो उसके लिए सबसे सीधा रास्ता यह है कि राइनमेटल को ब्लैकलिस्ट से हटाकर भारत डायनामिक्स के साथ मिलकर कम क़ीमत में मिसाइल खरीदी और बनाई जा सकती है. दलालों को रास्ते से आसानी से हटाया जा सकता है. इससे हम कम क़ीमत में मिसाइल बनाने में सफल हो सकते थे, लेकिन रक्षा मंत्रालय राइनमेटल से सीधे मिसाइल न खरीद कर उसी की एक कंपनी राफेल से सौदा कर रहा है और बाबा कल्याणी के साथ मिलकर भारत में मिसाइल बनाने के साधन दे रहा है, मदद कर रहा है. इस फैसले ने दलालों और बिचौलियों के लिए रास्ता खोल दिया है. जितना पैसा दलाली में खर्च होगा, वह सब मिसाइल की क़ीमत में जुड़ जाएगा. इसलिए इस फैसले से मिसाइल की क़ीमत भी ज़्यादा हो जाएगी.
एक तऱफ भारतीय सेना की ज़रूरतें हैं और दूसरी तऱफ हथियार माफिया है, जो भारतीय सेना की हर खरीद-बिक्री में अपनी कमाई का रास्ता निकालने में जुटा हुआ है. इसमें कोई शक नहीं कि आज भारतीय थल, जल और वायु सेना हथियारों के अभाव के जिस संकट से ग़ुजर रही है, उसकी जड़ में हथियार माफिया है. उसकी वजह से हथियारों के अभाव के साथ-साथ क़दम-क़दम पर भ्रष्टाचार का बोलबाला है. और, इस सबका खामियाजा देश की सेना को उठाना पड़ता है. ऐसे में सरकार को चाहिए कि वह खरीद-बिक्री का एक ऐसा तरीका अपनाए, जिसमें हथियार के दलालों का कोई रोल न हो. दूसरी और सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि देश की सुरक्षा के लिए विश्वस्तरीय टेक्नोलॉजी मुहैय्या कराने की हरसंभव कोशिश होनी चाहिए, ताकि भारतीय सेना को अत्याधुनिक हथियार मिल सकें, जिससे दुश्मन थर्राएं. हमारे जवानों के लिए अत्याधुनिक गैजेट्स, ड्रेस और उत्तम भोजन की व्यवस्था होनी चाहिए, ताकि उनका हौसला बुलंद रहे. यह सब तब तक नहीं हो सकता, जब तक भारतीय सेना की खरीद-बिक्री में हथियार माफिया का हस्तक्षेप रहेगा. रक्षा मंत्रालय पर हथियार माफिया का जाल ऐसा फैला हुआ है कि कई सरकारों ने उसके सामने घुटने टेक दिए. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रक्षा मंत्री को हर सौदे पर नज़र रखने की ज़रूरत है. जबसे नई सरकार आई है, तबसे जितने भी ़फैसले हुए हैं और उन्हें किस तरह लागू किया जा रहा है, इस पर भी नज़र रखने की ज़रूरत है. क्योंकि, जरा-सी चूक सरकार का दामन दागदार कर देगी. किसी को पता भी नहीं चलेगा और प्रधानमंत्री जी की नज़रों के सामने घोटाला हो जाएगा.
भारत सरकार सेना के लिए जो भी चीज खरीदती है, चाहे वह हथियार हो, कारतूस हो, हवाई जहाज हो, युद्धपोत हो, मिसाइल हो, उसके लिए वह क्वॉलिटी रिक्वायरमेंट यानी आवश्यक गुणवत्ता जारी करती है. यानी सेना बताती है कि उसे क्या चाहिए, किस उद्देश्य के लिए चाहिए, उसकी गुणवत्ता कैसी होनी चाहिए और कितनी संख्या में चाहिए? उसके बाद हथियार बनाने वाली कंपनियां अपना प्रस्ताव भेजती हैं. समझने वाली बात यह है कि अगर कोई भी चीज हम दूसरे देश से खरीदते हैं, तो विक्रेता देश खरीददार को अपनी लेटेस्ट टेक्नोलॉजी नहीं देता. वह वही चीज देता है, जो उसके यहां पहले इस्तेमाल हो चुकी होती है या फिर जिसका नवीन संस्करण आ चुका हो. या फिर वह चीज, जो ग़रीब देशों के लिए बनाई गई हो, ताकि वे कभी भी उसके (विक्रेता) हथियारों को मैच न कर सकें यानी उसके हथियारों के साथ मुक़ाबला न कर सकें. होना तो यह चाहिए कि अगर हम क़ीमत देने को तैयार हैं, तो हमें अत्याधुनिक और हमारी उपयोगिता के अनुकूल हथियार मिलें. लेकिन हक़ीक़त में ऐसा होता नहीं है. यहीं से हथियार माफिया का खेल शुरू होता है. विडंबना यह है कि देश के अधिकारी ही आवश्यक गुणवत्ता यानी क्वॉलिटी रिक्वायरमेंट को हल्का कर देते हैं. यह काम सेना और मंत्रालय में बैठे अधिकारी करते हैं. हर जगह ऐसे लोग बैठे हैं, जो गुणवत्ता के मापदंड ऐसे रखते हैं, जो हथियार माफिया के प्रस्ताव से बिल्कुल मिलते- जुलते हों. हथियार के दलाल किसी न किसी की कंपनी के लिए लॉबिंग करते हैं. भारत सरकार को उनके (विदेशी कंपनियों के) हथियार बेचने के लिए वे उनसे काफी पैसे लेते हैं. वे रिपोर्ट बनाने वाले अधिकारियों और उनसे जुड़े लोगों को पैसे देते हैं, ताकि अधिकारी हथियार की क्वॉलिटी तब तक गिराते रहें, जब तक वह दलालों के माल से मैच न कर जाए.
इसके बाद सौदे से संबंधित हथियार-उपकरण अथवा सामान का परीक्षण होता है. उसमें भी गड़बड़िया होती हैं. बोफोर्स कांड में यही हुआ था. जब तक क्वात्रोची उस डील में नहीं घुसे, तब तक परीक्षण में बोफोर्स पिछड़ रही थी, लेकिन जैसे ही क्वात्रोची उसमें बिचौलिया बने, ट्रायल में बोफोर्स पहली पसंद बन गई. जानकार बताते हैं कि अगर कोई इस क्यूआर में फेरबदल करने की कोशिश करता है, तो उसे पूरी प्रक्रिया से बाहर कर दिया जाता है या फिर उस पर दबाव डाला जाता है. कागज पर तो यह प्रक्रिया बिल्कुल सटीक नज़र आती है, लेकिन हक़ीक़त में यह सारी प्रक्रिया इसलिए होती है, ताकि संबंधित सामान मुहैय्या कराने के लिए आ़िखर में स़िर्फ एक या दो ही कंपनी बचे. यह वह कंपनी होती है, जिसके लिए हथियार माफिया लॉबिंग कर रहा होता है. अब जब एक ही सप्लायर बच जाता है, तो सरकार के पास उससे सौदा करने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं बचता. रक्षा मंत्रालय की ज़्यादातर खरीद में यही होता है. और, स्पाइक मिसाइल मामले में भी यही हो रहा है.
कहने का मतलब यह कि सेना की जो भी ज़रूरत हो, सरकार कुछ भी खरीदना चाहे, ड्रेस या फिर मिसाइल, आ़िखरकार वह सब दलालों के हाथों ही खरीदना पड़ता है. इससे कोई फर्क़ नहीं पड़ता कि वह हथियार या सामान विश्वस्तरीय है या नहीं. भारतीय सेना के लिए उपयोगी है या नहीं. यही वजह है कि भारतीय सेना को हमेशा घटिया उपकरण मिलते रहे हैं. एक तऱफ उसे हथियार विश्वस्तरीय नहीं मिलते, वहीं दूसरी तऱफ बुलेटप्रूफ जैकेट इतनी भारी दी जाती है, जिसे जवान पहनना नहीं पसंद करते. बर्फीले इलाके में जवानों को दिए जाने वाले जूते ऐसे होते हैं, जिनसे उनके पैर खराब हो जाते हैं. खराब सामान लेने का सिलसिला कई सालों से चला आ रहा है. मीडिया में भी कई बार खबरें आ चुकी हैं, लेकिन रक्षा मंत्रालय में बैठे मंत्री से लेकर अधिकारियों तक की नज़र आज तक इस ओर नहीं गई. धांधली का आलम यह है कि कई बार ऐसा होता है कि जो सामान हम खरीदते हैं, उसका जवाब या उससे बेहतर हथियार चीन या पाकिस्तान के पास पहले से उपलब्ध होता है. हमारे हज़ारों करोड़ रुपये बर्बाद हो जाते हैं. एक उदाहरण देता हूं. बुमार पोलेंड कंपनी से हमने आर्म्ड रिकवरी व्हीकल लिया. यह लैंड माइन क्लियर करता है और रास्ता बनाता है. लेकिन, देश के नक्सलियों और आतंकियों के पास लैंडमाइन बिछाने की वह तकनीक मौजूद है, जिसमें यह काम नहीं करता. इसलिए हमारे ये वाहन बेकार हो गए.
भारत में हथियार लॉबी बहुत सक्रिय और संगठित तरीके से काम करती है. उसके आगे सरकार की भी नहीं चलती. वह पैसे के दम पर अपने हिसाब से सौदा तय करती है. ऐसा लगता है, मानो रक्षा मंत्रालय भारतीय सेना के लिए सामान खरीदने के लिए नहीं, बल्कि हथियार के दलालों को फायदा पहुंचाने के लिए काम करता है. भारत में हथियार लॉबी बहुत बड़ी नहीं है. पांच से दस लोगों का एक कॉकस है, गैंग है. उसके सबसे बड़े और किंग पिन का नाम सुधीर चौधरी है, जो इंग्लैंड में रहकर सब कुछ ऑपरेट करता है. बराक मिसाइल की आपूर्ति में हुए घोटाले में भी उसका नाम आया था, लेकिन सीबीआई ने केस बंद कर दिया. सीबीआई ने कहा कि वह उसके खिला़फ कोई सुबूत एकत्र नहीं कर सकी. मीडिया भी चौधरी के बारे में नहीं बताता कि उसके पारिवारिक रिश्ते किन-किन पार्टियों के किन-किन नेताओं के साथ हैं. इसके अलावा भी कुछ और नाम हैं, जिनका खुलासा अलग-अलग हथियार सौदों में हुआ है, जिनमें सुरेश नंदा, रवि ऋषि और अभिषेक वर्मा शामिल हैं. उक्त सारे लोग मिल-जुल कर काम करते हैं. उनके साथ सेना एवं रक्षा मंत्रालय के अधिकारी, विभिन्न पार्टियों के नेता और पत्रकार मिल-जुल कर काम करते हैं. यह एक ऐसा गैंग है, जो हर सौदे पर मुना़फा कमाता है. इससे कोई फर्क़ नहीं पड़ता कि सरकार किस पार्टी की है और मंत्री कौन है. मजेदार बात यह है कि दिल्ली के सत्ता के गलियारों में इसे सारे लोग बखूबी जानते हैं.
अब स्पाइक मिसाइल की बात करते हैं. जर्मनी की एक हथियार कंपनी है, राइनमेटल. इसे ब्लैकलिस्ट कर दिया गया है. लेकिन, इस कंपनी की देश की हथियार लॉबी के साथ साठगांठ है. यह उन्हें पैसा देती है. भारत के कई रिटायर सैन्य अधिकारी राइनमेटल कंपनी के कंसलटेंट हैं, उसके एडवाइजरी पैनल में हैं. यह कंपनी भारत में खूब पैसा खर्च करती है. सरकार ने जब एंटी टैंक मिसाइल खरीदने का फैसला किया, तो यह कंपनी सीधे तौर पर इस सौदे में हिस्सा नहीं ले सकती थी. मजेदार बात यह है कि जिस यूरोस्पाइक नामक कंपनी के ज़रिये इस मिसाइल की मार्केटिंग की जाती है, उसमें राइनमेटल कंपनी की 40 फीसद हिस्सेदारी है. कहने का मतलब यह कि तकनीकी तौर पर इसे इजराइल की राफेल कंपनी बनाती है, लेकिन इसे बेचने में राइनमेटल की हिस्सेदारी है. सीधे शब्दों में अगर समझा जाए, तो राइनमेटल खुद इसकी सप्लाई न करके इजराइल की राफेल के ज़रिये सप्लाई कराएगी. राइनमेटल एक हथियार कंपनी है, जिसका पैसा दुनिया की विभिन्न कंपनियों में लगा हुआ है. सरकार को पता लगाना चाहिए कि इजराइल की राफेल कंपनी के साथ राइनमेटल का क्या रिश्ता है? बताया जाता है कि राफेल के 40 फीसद शेयर राइनमेटल के पास हैं. अगर हमें राइनमेटल से ही मिसाइल खरीदनी है, तो यह सौदा बैन हटाकर सीधे उसी से किया जा सकता है. इससे पैसे की बचत हो सकती है.
जब भी कोई हथियार या अन्य सामान खरीदा जाता है, तो सरकार पहले अपनी इच्छा जताती है और फिर अलग-अलग कंपनियों से प्रस्ताव आते हैं. जो प्रस्ताव सही होता है, उसे मंजूर कर लिया जाता है. यह सौदा सरकार मेक इन इंडिया के तहत करना चाहती है. रक्षा मंत्रालय ने इस बात पर ध्यान नहीं दिया कि राफेल का राइनमेटल से क्या रिश्ता है? अगर राफेल से राइनमेटल का कोई रिश्ता है और उसी कंपनी से मिसाइल खरीदना तय है, तो उसके ब्लैकलिस्ट होने का कोई मतलब नहीं है. सवाल यह है कि रक्षा मंत्रालय ने इस तथ्य की तऱफ ध्यान क्यों नहीं दिया? किस लॉबी के दबाव में यह फैसला लिया गया? इस फैसले में कौन-कौन लोग शामिल हैं? क्या इस सौदे के लिए दलाली के रूप में पैसे दिए गए? इन सारे सवालों का जवाब सरकार के पास होना चाहिए और उसे देश की जनता को इसके बारे में बताना चाहिए. मजेदार बात यह है कि उक्त सारे फैसले मोदी सरकार बनने के बाद लिए गए हैं. इसलिए यह भी नहीं कहा जा सकता कि कांग्रेस सरकार ने यह फैसला लिया था. यह सौदा मेक इन इंडिया के तहत होना है. मतलब यह कि इसे बनाने का काम भारत में किया जाएगा. तो अब सवाल यह है कि इसे कौन बनाएगा? क्या इजराइल की कंपनी भारत में मिसाइल बनाने की यूनिट लगाएगी या किसी और निजी कंपनी को इसकी इजाजत दी जाएगी?
नोट करने वाली बात यह है कि भारत सरकार की अपनी एक कंपनी है, जहां पहले से मिसाइल बनाई जा रही है. इसका नाम है, भारत डायनामिक्स लिमिटेड. वह पिछले कई सालों से मिसाइल बनाने का काम सफलता से कर रही है. अगर भारत में ही स्पाइक मिसाइल बननी है, तो उसे भारत डायनामिक्स के ज़रिये बनाया जा सकता है. उसके पास अनुभवी लोग हैं, टेक्नोलॉजी है, इंफ्रास्ट्रक्चर है. भारत डायनामिक्स के पास मिसाइल बनाने का पूरा सेटअप है और सबसे बड़ी बात यह कि वह सरकारी है. मिसाइल के किसी दूसरे देश या संगठन को बेचने का खतरा नहीं है. क्या बन रहा है और कितनी संख्या में बनाया जा रहा है, सब कुछ सरकार के नियंत्रण में रहेगा. यह सस्ता भी पड़ेगा. लेकिन, हैरानी की बात यह है कि भारत डायनामिक्स के प्रस्ताव पर रक्षा मंत्रालय ने ग़ौर भी नहीं किया. उसकी जगह रक्षा मंत्रालय ने बाबा कल्याणी नामक एक छोटी-सी कंपनी को हरी झंडी दे दी. इजराइल की राफेल कंपनी अब बाबा कल्याणी के साथ ज्वाइंट वेंचर में भारत में स्पाइक मिसाइल बनाएगी. फिर वही सवाल कि इस कंपनी पर रक्षा मंत्रालय क्यों मेहरबान हुआ? इस कंपनी का भारत की हथियार लॉबी से क्या रिश्ता है? क्या मोदी सरकार हथियार के दलालों को हथियार निर्माता बनने में मदद कर रही है? यह सवाल इसलिए भी उठाना ज़रूरी है, क्योंकि इस कंपनी के पास मिसाइल बनाने का न तो अनुभव है, न उसके पास लोग हैं, न उसके पास टेक्नोलॉजी है और न भारत में उसका इंफ्रास्ट्रक्चर है. मतलब यह कि बाबा कल्याणी को सरकार इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करने में तरह-तरह की मदद करेगी. भारत में कंपनी स्थापित करने में जो खर्च आएगा, वह भी मिसाइल की क़ीमत में जुड़ेगा. कोई भी कंपनी अपना ऩुकसान करके मेक इन इंडिया में क्यों इंवेस्ट करेगी? यही वजह है कि स्पाइक मिसाइल की क़ीमत दोगुनी हो गई और नई-नई शर्तें सामने आ गईं. अगर उसकी बातें मान ली गईं, तो शायद सरकार जवाब देने लायक नहीं बचेगी.
जानकार बताते हैं कि भारत डायनामिक्स के ज़रिये मिसाइल बनाने में दलालों को ऩुकसान होगा. चूंकि वह एक सरकारी कंपनी है और उसमें एक-एक पैसे का हिसाब और ऑडिटिंग होती है, इसलिए वहां घोटाला करना नामुमकिन है. सरकारी कंपनी दलाली के नाम पर पैसे नहीं बांट सकती. लेकिन, यदि किसी निजी कंपनी के ज़रिये यह सौदा होता है, तो दलालों के लिए रास्ता खुल जाता है. दलाली के नाम पर पैसे की बंदरबांट हो सकती है. बाबा कल्याणी को अगर मिसाइल बनाने की अनुमति दी जाती है, तो हथियार लॉबी को कई फायदे हैं. कंपनी लगाने में वह अपनी ब्लैक मनी खपा सकती है. अधिकारियों को उनका हिस्सा मिल जाएगा और निजी कंपनी का भी विस्तार हो जाएगा. अब सवाल है कि क्या यह फैसला जानबूझ कर लिया गया, ताकि दलाली के पैसे की बंदरबांट हो सके या फिर कोई और तर्क है? इसका खुलासा सरकार को सार्वजनिक रूप से करना चाहिए. अगर भारत को स्पाइक मिसाइल ही चाहिए, तो उसके लिए सबसे सीधा रास्ता यह है कि राइनमेटल को ब्लैकलिस्ट से हटाकर भारत डायनामिक्स के साथ मिलकर कम क़ीमत में मिसाइल खरीदी और बनाई जा सकती है. दलालों को रास्ते से आसानी से हटाया जा सकता है. इससे हम कम क़ीमत में मिसाइल बनाने में सफल हो सकते थे, लेकिन रक्षा मंत्रालय राइनमेटल से सीधे मिसाइल न खरीद कर उसी की एक कंपनी राफेल से सौदा कर रहा है और बाबा कल्याणी के साथ मिलकर भारत में मिसाइल बनाने के साधन दे रहा है, मदद कर रहा है. इस फैसले ने दलालों और बिचौलियों के लिए रास्ता खोल दिया है. जितना पैसा दलाली में खर्च होगा, वह सब मिसाइल की क़ीमत में जुड़ जाएगा. इसलिए इस फैसले से मिसाइल की क़ीमत भी ज़्यादा हो जाएगी.
एक तऱफ भारतीय सेना की ज़रूरतें हैं और दूसरी तऱफ हथियार माफिया है, जो भारतीय सेना की हर खरीद-बिक्री में अपनी कमाई का रास्ता निकालने में जुटा हुआ है. इसमें कोई शक नहीं कि आज भारतीय थल, जल और वायु सेना हथियारों के अभाव के जिस संकट से ग़ुजर रही है, उसकी जड़ में हथियार माफिया है. उसकी वजह से हथियारों के अभाव के साथ-साथ क़दम-क़दम पर भ्रष्टाचार का बोलबाला है. और, इस सबका खामियाजा देश की सेना को उठाना पड़ता है. ऐसे में सरकार को चाहिए कि वह खरीद-बिक्री का एक ऐसा तरीका अपनाए, जिसमें हथियार के दलालों का कोई रोल न हो. दूसरी और सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि देश की सुरक्षा के लिए विश्वस्तरीय टेक्नोलॉजी मुहैय्या कराने की हरसंभव कोशिश होनी चाहिए, ताकि भारतीय सेना को अत्याधुनिक हथियार मिल सकें, जिससे दुश्मन थर्राएं. हमारे जवानों के लिए अत्याधुनिक गैजेट्स, ड्रेस और उत्तम भोजन की व्यवस्था होनी चाहिए, ताकि उनका हौसला बुलंद रहे. यह सब तब तक नहीं हो सकता, जब तक भारतीय सेना की खरीद-बिक्री में हथियार माफिया का हस्तक्षेप रहेगा. रक्षा मंत्रालय पर हथियार माफिया का जाल ऐसा फैला हुआ है कि कई सरकारों ने उसके सामने घुटने टेक दिए. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रक्षा मंत्री को हर सौदे पर नज़र रखने की ज़रूरत है. जबसे नई सरकार आई है, तबसे जितने भी ़फैसले हुए हैं और उन्हें किस तरह लागू किया जा रहा है, इस पर भी नज़र रखने की ज़रूरत है. क्योंकि, जरा-सी चूक सरकार का दामन दागदार कर देगी. किसी को पता भी नहीं चलेगा और प्रधानमंत्री जी की नज़रों के सामने घोटाला हो जाएगा.

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