शिक्षक दिवस: आज जररूत हैं एजुकेशन सिस्टम को बाजारू न होने देने को।

शिक्षक  दिवस जिन्हे  हम डा . सर्वपल्ली राधाकृष्णन के याद में  मानते   है . , क्यों हम मानते है उनके जन्मदिवस के  याद में ,अगर मानते है तो  क्या इस समय  भी शिक्षक और बच्चे में वही प्रेम बरक़रार है? क्या आज  भी  कृष्णन के बताये रास्ते पर  शिक्षा प्रणाली चल रही  है? शायद नहीं …? क्योकि आज शिक्षा में जिस प्रकार से एक गैप आ चुका है  ठीक उसी प्रकार से शिक्षक और बच्चे में भी आया हैं . मुझे भी विश्वास न हो रहा था । पर वास्तव में कुछ प्रश्न  ऐसे  है ,जिसका जवाब  जुटा  पाना इतना मुश्किल हो गया कि  लोग चाह  कर भी नही जुटा पा रहे है ।क्योकि आज एजुकेशन एक बाजार बन चुका जिसमे कही  न कही  हमारा समाज का बहुत बड़ा योगदान रहा हैं । शायद यही कारण कि आज के बच्चे भी  शिक्षक से दुरी बना लेते है।  हमे एजुकेशन को बाजार से बाहर लाने  की जररूत हैं ।  तभी जाकर  राधाकृष्णन को सच्ची
श्रद्धांजलि होगी .... कहा भी गया है कि
गुरु गोबिंद दोउ खड़े, काके लागूँ पाएं,
बलिहारी गुरु आपके, जिन गोबिंद दिओ बताए. 
 शिक्षक उस मोमबत्ती के समान होता है जो खुद जलकर दूसरों को रोशनी देता है. गुरु की महिमा अनंत है।  

टिप्पणियाँ