क्यो मनाया जाता है 25दिसंबर को जन्मदिन ईसा मसीह का ?
दिव्यम की
कलम से......
क्यो मनाया
जाता है 25दिसंबर को जन्मदिन ईसा मसीह का ?
खास दिन है ......ईसाइयों
धर्मो के लिये यह दिन .............
कौन है ? ईसा मसीह.......
लगभग दो
हज़ार वर्षों से हमारी दुनिया के अधिकतर लोगों ने वास्तव में ईसा मसीह का
अस्तित्व माना है जिनका असाधारण चरित्र, नेतृत्व
और जिनकी प्रकृति पर शक्ति थी।
कौन है ? ईसा मसीह
बाइबिल के अनुसार ईसा की माता मरियम गलीलिया
प्रांत के नाज़रेथ गाँव की रहने वाली थीं। उनकी सगाई दाऊद के राजवंशी यूसुफ नामक
बढ़ई से हुई थी। विवाह के पहले ही वह कुँवारी रहते हुए ही ईश्वरीय प्रभाव से
गर्भवती हो गईं। ईश्वर की ओर से संकेत पाकर यूसुफ ने उन्हें पत्नीस्वरूप ग्रहण
किया। इस प्रकार जनता ईसा की अलौकिक उत्पत्ति से अनभिज्ञ रही। विवाह संपन्न होने
के बाद यूसुफ गलीलिया छोड़कर यहूदिया प्रांत के बेथलेहेम नामक नगरी में जाकर रहने
लगे, वहाँ ईसा का जन्म हुआ। शिशु को राजा हेरोद के
अत्याचार से बचाने के लिए यूसुफ मिस्र भाग गए। हेरोद 4 ई.पू. में चल
बसे अत: ईसा का जन्म संभवत: 4 ई.पू. में हुआ था। हेरोद के मरण के बाद यूसुफ लौटकर नाज़रेथ गाँव
में बस गए। ईसा जब बारह वर्ष के हुए, तो यरुशलम में
तीन दिन रुककर मन्दिर में उपदेशकों के बीच में बैठे, उन की
सुनते और उन से प्रश्न करते हुए पाया। लूका 2:47 और जितने
उस की सुना वे सब उस की समझ और उसके उत्तरों से चकित थे। तब ईसा उसका माता पिता के
सात अपना गांव वापिस लौट गए। ईसा ने यूसुफ का पेशा सीख लिया और लगभग 30 साल की उम्र तक उसी गाँव में रहकर वे बढ़ई
का काम करते रहे। बाइबिल (इंजील) में उनके 13 से 29 वर्षों
के बीच का कोई ज़िक्र नहीं मिलता। 30 वर्ष की
उम्र में उन्होंने यूहन्ना (जॉन) से पानी में डुबकी (दीक्षा) ली। डुबकी
के बाद ईसा पर पवित्र आत्मा आया। 40 दिन के उपवास
के बाद ईसा लोगों को शिक्षा देने लगे।
क्यो मनाया
जाता है 25 को जन्मदिन मसीह का ?
यीशु के पैदा होने और मरने के सैकड़ों साल
बाद जाकर कहीं लोगों ने दिसंबर 25 को
उसका जन्मदिन मनाना शुरू किया था। मगर इस तारीख को
यीशु का जन्म नहीं हुआ था, क्योंकि
सबूत दिखाते हैं कि वह अक्टूबर महीने में पैदा हुआ था, दिसंबर
में नहीं। * तो फिर, उसका
जन्मदिन
मनाने के लिए दिसंबर 25 की
तारीख क्यों चुनी गयी? दरअसल ईसाई होने का दावा करने वाले
कुछ लोगों ने बाद में जाकर इस दिन को चुना था। क्योंकि इस दिन “रोम के गैर-ईसाई लोग ‘अजेय सूर्य का
जन्मदिन’ मनाते थे,” और ईसाई “चाहते थे कि
मसीह के जन्म का जश्न भी इसी दिन मनाया जाए।” (द न्यू
इनसाइक्लोपीडिया ब्रिटैनिका) सर्दियों के मौसम में जब सूरज की
गरमी कम हो जाती, तो गैर-ईसाई इस इरादे से पूजा-पाठ
करते और रीति-रस्म मनाते थे कि सूरज अपनी लंबी यात्रा से लौट आए और दोबारा उन्हें
गरमी और रोशनी दे।
उनका मानना था कि दिसंबर 25 को
सूरज लौटना शुरू करता है। इस त्योहार और इसकी रस्मों को ईसाई धर्म-गुरुओं ने अपने
धर्म में मिला लिया और इसे “ईसाइयों का
त्योहार” नाम दिया ।







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